श्रीकृष्ण भगवान ने गीताजी के दूसरे अध्याय ' सांख्ययोग ' में श्लोक नंबर 54 से 72 तक, अर्जुन के साथ स्थितप्रज्ञ के बारे में बहुत ही उत्तम चर्चा की है । ईस के बारे में हमने लेख नंबर (9), पेज नंबर 25-26-27 में सविस्तर चर्चा की है । किसी एक सज्जन ने सोचा कि ये लक्षण तो स्वाभाविक रुप से बहुत ही उत्तम हैं । लेकिन जीवन में ईनका आचरण संभवित है क्या ? कोई मानवी संपूर्ण रुप से स्थितप्रज्ञ हो सकता है क्या ?
श्री स्वामी शिवानंद ज्ञानयज्ञ निधि, दिव्य जीवन संघ, अमदावाद द्वारा प्रकाशित " અમૃતધારા " नाम की पुस्तक में आमुख में (पेज नं.V) ईसके बारे में बहुत सुंदर लिखा है कि – एक बार वृदावन में श्रीमत् स्वामी अखंडानंदजी महाराज, गीताजी के भक्तियोग के बारे में समझा रहे थे तब किसी सज्जन ने पूछा – " क्या भक्त के ऐसे लक्षण कलियुग में संभवित हैं ? " एक क्षण के भी विलंब के बिना स्वामीजी महाराज ने कहा – " अरे ! ये तो सिर्फ कुछ गिने चुने लक्षण हैं..., हमारे स्वामी श्री चिदानंदजी महाराज तो बहुगुनी हैं... कई गुनों के धनी हैं । "
ऐसा ही प्रसंग लखनौ में श्रीमत् स्वामी चिन्मयानंदजी महाराज के गीताज्ञान यज्ञ में हुआ था । किसीने पूछा – क्या स्थितप्रज्ञ मानवी संभवित है ? क्रोध नहीं करनेवाले किसी मानवी को आपने कभी देखा है क्या ? स्वामी श्री चिन्मयानंदजी का उत्तर था – " जी हां ! स्थितप्रज्ञ संभवित हैं । मैंने उनको देखे हैं और उनका अनुभव भी किया हुआ है । शिवानंद आश्रम-ऋषिकेश के परमाध्यक्ष स्वामी श्री चिदानंदजी महाराज स्थितप्रज्ञ हैं । उनको क्रोधित होते हुए कभी भी देखे या सुने नहीं है।"
गीताजी के दूसरे अध्याय में " स्थितप्रज्ञ " के लक्षणों की बात, बारह वें अध्याय में " परम भक्त " के लक्षणों की बात और चौदह वें अध्याय में "त्रिगुणातीत" मानवी के लक्षणों की बात एक ही है । सिर्फ भिन्न भिन्न शब्द हैं । स्थितप्रज्ञ, परम भक्त या त्रिगुणातीत ये एक दूसरे के पर्याय हैं । ईसी लिए बेवजह उलझने की जरुरत नहीं है ।
स्थितप्रज्ञ दु:ख में उद्विग्न नहीं होते और उन्हें सुख की स्पृहा नहीं होती । स्वामी श्री चिदानंदजी महाराज परम सन्यासी थे, मतलब कि उन्हें सुख की कोई स्पृहा न थी । लेकिन दु:ख से उद्विग्न हो जाते थे । "અમૃતધારા " पुस्तक उनके जीवन आधारित प्रसंगों पर लिखी गई है, यह पढते ऐसा कह सकते हैं कि स्वामी श्री चिदानंदजी महाराज दु:ख से बहुत ही व्यथित हो जाते थे । तो उन्हें स्थितप्रज्ञ कैसे कहें ? कुछ अजीब है ।
(1) गंगाजी के तट पर किसी कुष्ट रोगी को देखकर बहुत व्यथित हो जाते थे । उसे अपने कंधों पर बिठाकर आश्रम में ले आते थे । उसके घाव स्वच्छ कर के, मरहम पट्टी कर के, उसे प्रेम से भोजन खिलाते थे । ऐसे कुष्ट रोगीओं की, नियमित देखभाल करते थे ।
(2) किसी अकस्मात की वजह से एक कुत्ता घायल हुआ । ईसे देखकर स्वामीजी व्यथित हो गए । दूसरा कोई वाहन उसे ईजा न करे, ईसी लिए उसके ईर्दगिर्द पथ्थर रखकर उसके रक्षण की व्यवस्था की । आश्रम में जाकर एक डोक्टर को ले आए । पशु चिकित्सालय मे उसकी देखभाल अच्छी तरह से होगी, लेकिन ऐसे कुत्ते की शायद देखभाल न हो, ऐसी बात होने से, अपने गेरुआ वस्त्र में से एक टुकडा फाडकर, कुत्ते के गले में लपेट दिया । कुत्ते को पशु चिकित्सालय में ले जाने को और स्वामी चिदानंदजी का पाला हुआ कुत्ता है, और उसकी चिकित्सा का खर्च आश्रम देगा, ऐसा कहेने को, अपने शिष्य को सूचना दी ।
(3) किसी उत्सव के प्रसंग पर, सुशोभन के लिए कोई कुछ पौधे ले आया । कार्य की व्यस्तता की वजह से, पौधे को पानी देना भूल गए, तो पौधे मुरझाने लगे । खुद अक्षम होने से स्वामीजी भी पौधे को पानी दे न शके । लेकिन वे बहुत व्यथित हो गए । उन्होंने खुद पानी पीना छोड दिया । पता चलने से शिष्यों शरमिंदा हो गए और पौधे को और स्वामीजी को गंगाजल पिलाया ।
सभी में परमात्मा के दर्शन करनेवाले और दूसरों के दु:ख से व्यथित होनेवाले विरल मानवी, परम पूज्य श्रीमत् स्वामी चिदानंदजी महाराज को स्थितप्रज्ञ कहेनेवाले पूज्य स्वामी श्री अखंडानंदजी और स्वामी श्री चिन्मयानंदजी की बात हमें माननी ही पडे, ऐसी है ना !
श्री स्वामी नारायण संप्रदाय के स्वामी श्री ब्रह्मानंदजी ने संत की बहुत सुंदर परिभाषा समझाई है -
"संत परम हितकारी जगत मांही संत परम हितकारी....
त्रिगुणातीत, तीरथ तन, त्यागी, रीत जगत से न्यारी,
परम कृपालु सकल जीवन पर, हरि सम सब दुख हारी.... जगत मांहीं
प्रभु पद प्रगट करावत प्रीति, भरम मिटावत भारी,
' ब्रह्मानंद ' संतन की सोबत, करत है प्रगट मुरारी ... जगत मांहीं
" અમૃતધારા " यह सिर्फ परम पूज्य स्वामी श्री चिदानंदजी महाराज की प्रशंसा करने के लिए लिखी गई पुस्तक नहीं है । संत कैसे होते हैं ? कैसे संत समाज के लिए कल्याण कारी हैं ? स्व कल्याण नहीं लेकिन सभी के कल्याण के लिए सतत परिश्रम और चिंतन करनेवाला परम संत ही हमें प्रभुदर्शन करा सकते हैं । सिर्फ, प्रभु दर्शन के लिए, हमारी योग्यता और तीव्र झंखना होनी चाहिये ।
पूज्य श्री विनोबा भावे की पुस्तक " गीता दर्शन " में, (पेज नं. 6) उन्होंने बहुत सुंदर लिखा है कि - "गीता में स्थितप्रज्ञ के लक्षणों की बात है । यह वर्णन के अनुसार का, स्थितप्रज्ञ शरीरधारी शायद ही कोई मिले । मगर ईन लक्षणों के बहुत नजदीक पहुंचे हुए, महापुरुष को मैं ने अपनी ही आंखोंसे देखा ।" - महात्मा गांधीजी को भारत का सर्वोच्च पद यानि कि प्रधानमंत्री का पद बहुत ही सरलता से मिल सकता था, लेकिन उन्होंने उसका अस्वीकार किया । क्योंकि वे सच्चे निस्पृही थे । गीताजी के 'अनासक्तियोग' के बारे में लिखनेवाले ने अनासक्ति का आचरण किया । किसी एक दरीद्र महिला को पहनने के लिए पूरे वस्त्र नहीं है, यह जानकर, वे बहुत ही व्यथित हो गए । उन्होंने अपने बारे में, बहुत ही मर्यादित वस्त्र पहनने का अभूतपूर्व निर्णय किया ।
स्वामी श्री रामकृष्ण परमहंस सभी मे परमात्मा के दर्शन करते थे । श्री नरेन्द्रनाथ ने पहली मुलाकात के वक्त पूछा - " आपने कभी परमात्मा के दर्शन किए हैं ? मुझे करा सकोगे ? " स्वामीजी ने सहज भाव से कहा - " हां बेटा ! जैसे तुझे देखता हूं, वैसे ही परमात्मा को देखता हूं । अगर तेरी उत्कट झंखना होगी तो तू भी दर्शन कर सकेगा । " स्वामी श्री विवेकानंदजी ने, उन्होंने परमात्मा के दर्शन किए हुए हैं, ऐसी बात शिकागो में, अपने प्रवचन में की थी । गीताजी में अध्याय नंबर 6 में श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है - " जो मुझे सर्वत्र देखता है और मैं ही सब में समाया हूं ऐसा मानता है, ईससे मैं अद्रश्य नहीं हूं और वह मुझ से अद्रश्य नहीं है । " अध्याय नंबर 10 में कहा है - " यह सब मेरी ही विभूति है । " गीताजी में जो बात कही गई है, उसके प्रत्यक्ष प्रमाण जैसे ये गुरु - शिष्य जिन्होंने परमात्मा के दर्शन किए हैं, वे दोनों परम वंदनीय है ।
परम संत श्री नरसिंह महेता हरिजनों के निमंत्रण से, हरिजन वास में, प्रभु के कीर्तन भजन के लिए गए । 500 साल पहेले लोग हरिजनों को छूते भी नहीं थे । सभी में परमात्मा है, ऐसा माननेवाले परम संत ने ढेढ, भंगी जैसे तिरस्कृत लोगों को हरिजन कहेकर, उनका बहुमान किया । उनको कोई यश तो न मिला मगर ज्ञातिजनों ने उनका बहिष्कार किया । फिर भी वे अटल रहे । आज 500 साल बाद हरिजनों की स्थिति में जो सुधार आया है, वह सच्चे संत के आशीर्वाद का नतीजा है । ऐसे स्थितप्रज्ञ मानवी ही समाज को बदल सकते हैं ।
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